FB २२९२/९३/४ - 2292/93/94 - a poem by Babuji , written on another national issue , but apt and pertinent even today .. Inspired by the verse and words from the Ramayan .. सूर समर करनी करही ~ harivansh rai Bachchan सर्वथा ही यह उचित है औ’ हमारी काल-सिद्ध, प्रसिद्ध चिर-वीरप्रसविनी, स्वाभिमानी भूमि से सर्वदा प्रत्याशित यही है, जब हमें कोई चुनौती दे, हमें कोई प्रचारे, तब कड़क हिमश्रृंग से आसिंधु यह उठ पड़े, हुन्कारे– कि धरती कँपे, अम्बर में दिखाई दें दरारें। शब्द ही के बीच में दिन-रात बसता हुआ उनकी शक्ति से, सामर्थ्य से– अक्षर– अपरिचित मैं नहीं हूँ। किन्तु, सुन लो, शब्द की भी, जिस तरह संसार में हर एक की, कमज़ोरियाँ, मजबूरियाँ हैं– शब्द सबलों की सफल तलवार हैं तो शब्द निर्बलों की पुंसक ढाल भी हैं। साथ ही यह भी समझ लो, जीभ को जब-जब भुजा का एवज़ी माना गया है, कण्ठ से गाया गया है और ऐसा अजदहा जब सामने हो कान ही जिसके न हों तो गीत गाना– हो भले ही वीर रस का वह तराना– गरजना, नारा लगाना, शक्ति अपनी क्षीण करना, दम घटाना। बड़ी मोटी खाल से उसकी सकल काया ढकी है। सिर्फ भाषा एक जो वह समझता है सबल हाथों की करारी चोट की है। ओ हमारे वज्र-दुर्दम देश के, विक्षुब्ध-क्रोधातुर जवानो ! किटकिटाकर आज अपने वज्र के-से दाँत भींचो, खड़े हो, आगे बढ़ो; ऊपर चढ़ो, बे-कण्ठ खोले। बोलना हो तो तुम्हारे हाथ की दी चोट बोले ! बहुरि बंदि खलगन सति भाएँ... खलों की (अ) स्तुति हमारे पूर्वजन करते रहे हैं, और मुझको आज लगता, ठीक ही करते रहे हैं; क्योंकि खल, अपनी तरफ से करे खलता, रहे टेढ़ी, छल भरी, विश्वासघाती चाल चलता, सभ्यता के मूल्य, मर्यादा, नियम को क्रूर पाँवों से कुचलता; वह विपक्षी को सदा आगाह करता, चेतना उसकी जगाता, नींद, तंद्रा, भ्रम भगाता शत्रु अपना खड़ा करता, और वह तगड़ा-कड़ा यदि पड़ा तो तैयार अपनी मौत की भी राह करता। आज मेरे देश की गिरि-श्रृंग उन्नत, हिम-समुज्ज्वल, तपःपावन भूमि पर जो अज़दहा आकर खड़ा है, वंदना उसकी बड़े सद्भाव से मैं कर रहा हूँ; क्योंकि अपने आप में जो हो, हमारे लिए तो वह ऐतिहासिक, मार्मिक संकेत है, चेतावनी है। और उसने कम नहीं चेतना मेरे देश की छेड़ी, जगाई। पंचशीली पँचतही ओढ़े रज़ाई, आत्मतोषी डास तोषक, सब्ज़बागी, स्वप्नदर्शी योजना का गुलगुला तकिया लगाकर, चिर-पुरातन मान्यताओं को कलेजे से सटाए, देश मेरा सो रहा था, बेखबर उससे कि जो उसके सिरहाने हो रहा था। तोप के स्वर में गरजकर, प्रध्वनित कर घाटियों का स्तब्ध अंतर, नींद आसुर अजदहे ने तोड़ दी, तंद्रा भगा दी। देश भगा दी। देश मेरा उठ पड़ा है, स्वप्न झूठा पलक-पुतली से झड़ा है, आँख फाड़े घूरता है घृण्य, नग्न यथार्थ को जो सामने आकर खड़ा है। प्रांत, भाषा धर्म अर्थ-स्वार्थ का जो वात रोग लगा हुआ था– अंग जिससे अंग से बिलगा हुआ था... एक उसका है लगा धक्का कि वह गायब हुआ-सा लग रहा है, हो रहा है प्रकट मेरे देश का अब रूप सच्चा ! अज़दहे, हम किस क़दर तुझको सराहें, दाहिना ही सिद्ध तू हमको हुआ है गो कि चलता रहा बाएँ।

An enigmatic superstar | The Shahenshah of Bollywood

Amitabh Bachchan, An enigmatic superstar | The Shahenshah of Bollywood

FB २२९२/९३/४ - 2292/93/94 -

a poem by Babuji , written on another national issue , but apt and pertinent even today ..
Inspired by the verse and words from the Ramayan ..

सूर समर करनी करही

~ harivansh rai Bachchan

सर्वथा ही
यह उचित है
औ’ हमारी काल-सिद्ध, प्रसिद्ध
चिर-वीरप्रसविनी,
स्वाभिमानी भूमि से
सर्वदा प्रत्याशित यही है,
जब हमें कोई चुनौती दे,
हमें कोई प्रचारे,
तब कड़क
हिमश्रृंग से आसिंधु
यह उठ पड़े,
हुन्कारे–
कि धरती कँपे,
अम्बर में दिखाई दें दरारें।

शब्द ही के
बीच में दिन-रात बसता हुआ
उनकी शक्ति से, सामर्थ्य से–
अक्षर–
अपरिचित मैं नहीं हूँ।
किन्तु, सुन लो,
शब्द की भी,
जिस तरह संसार में हर एक की,
कमज़ोरियाँ, मजबूरियाँ हैं–
शब्द सबलों की
सफल तलवार हैं तो
शब्द निर्बलों की
पुंसक ढाल भी हैं।
साथ ही यह भी समझ लो,
जीभ को जब-जब
भुजा का एवज़ी माना गया है,
कण्ठ से गाया गया है

और ऐसा अजदहा जब सामने हो
कान ही जिसके न हों तो
गीत गाना–
हो भले ही वीर रस का वह तराना–
गरजना, नारा लगाना,
शक्ति अपनी क्षीण करना,
दम घटाना।
बड़ी मोटी खाल से
उसकी सकल काया ढकी है।
सिर्फ भाषा एक
जो वह समझता है
सबल हाथों की
करारी चोट की है।

ओ हमारे
वज्र-दुर्दम देश के,
विक्षुब्ध-क्रोधातुर
जवानो !
किटकिटाकर
आज अपने वज्र के-से
दाँत भींचो,
खड़े हो,
आगे बढ़ो;
ऊपर चढ़ो,
बे-कण्ठ खोले।
बोलना हो तो
तुम्हारे हाथ की दी चोट बोले !

बहुरि बंदि खलगन सति भाएँ...
खलों की (अ) स्तुति
हमारे पूर्वजन करते रहे हैं,
और मुझको आज लगता,
ठीक ही करते रहे हैं;
क्योंकि खल,
अपनी तरफ से करे खलता,
रहे टेढ़ी,
छल भरी,
विश्वासघाती चाल चलता,
सभ्यता के मूल्य,
मर्यादा,
नियम को
क्रूर पाँवों से कुचलता;
वह विपक्षी को सदा आगाह करता,
चेतना उसकी जगाता,
नींद, तंद्रा, भ्रम भगाता
शत्रु अपना खड़ा करता,
और वह तगड़ा-कड़ा यदि पड़ा
तो तैयार अपनी मौत की भी राह करता।

आज मेरे देश की
गिरि-श्रृंग उन्नत,
हिम-समुज्ज्वल,
तपःपावन भूमि पर
जो अज़दहा
आकर खड़ा है,
वंदना उसकी
बड़े सद्भाव से मैं कर रहा हूँ;
क्योंकि अपने आप में जो हो,
हमारे लिए तो वह
ऐतिहासिक,
मार्मिक संकेत है,
चेतावनी है।
और उसने
कम नहीं चेतना
मेरे देश की छेड़ी, जगाई।
पंचशीली पँचतही ओढ़े रज़ाई,
आत्मतोषी डास तोषक,
सब्ज़बागी, स्वप्नदर्शी
योजना का गुलगुला तकिया लगाकर,
चिर-पुरातन मान्यताओं को
कलेजे से सटाए,
देश मेरा सो रहा था,
बेखबर उससे कि जो
उसके सिरहाने हो रहा था।
तोप के स्वर में गरजकर,
प्रध्वनित कर घाटियों का
स्तब्ध अंतर,
नींद आसुर अजदहे ने तोड़ दी,
तंद्रा भगा दी।
देश भगा दी।
देश मेरा उठ पड़ा है,
स्वप्न झूठा पलक-पुतली से झड़ा है,
आँख फाड़े घूरता है
घृण्य, नग्न यथार्थ को
जो सामने आकर खड़ा है।
प्रांत, भाषा धर्म अर्थ-स्वार्थ का
जो वात रोग लगा हुआ था–
अंग जिससे अंग से बिलगा हुआ था...
एक उसका है लगा धक्का
कि वह गायब हुआ-सा लग रहा है,
हो रहा है प्रकट
मेरे देश का अब रूप सच्चा !
अज़दहे, हम किस क़दर तुझको सराहें,
दाहिना ही सिद्ध तू हमको हुआ है
गो कि चलता रहा बाएँ।

FB २२९२/९३/४ - 2292/93/94 - a poem by Babuji , written on another national issue , but apt and pertinent even today .. Inspired by the verse and words from the Ramayan .. सूर समर करनी करही ~ harivansh rai Bachchan सर्वथा ही यह उचित है औ’ हमारी काल-सिद्ध, प्रसिद्ध चिर-वीरप्रसविनी, स्वाभिमानी भूमि से सर्वदा प्रत्याशित यही है, जब हमें कोई चुनौती दे, हमें कोई प्रचारे, तब कड़क हिमश्रृंग से आसिंधु यह उठ पड़े, हुन्कारे– कि धरती कँपे, अम्बर में दिखाई दें दरारें। शब्द ही के बीच में दिन-रात बसता हुआ उनकी शक्ति से, सामर्थ्य से– अक्षर– अपरिचित मैं नहीं हूँ। किन्तु, सुन लो, शब्द की भी, जिस तरह संसार में हर एक की, कमज़ोरियाँ, मजबूरियाँ हैं– शब्द सबलों की सफल तलवार हैं तो शब्द निर्बलों की पुंसक ढाल भी हैं। साथ ही यह भी समझ लो, जीभ को जब-जब भुजा का एवज़ी माना गया है, कण्ठ से गाया गया है और ऐसा अजदहा जब सामने हो कान ही जिसके न हों तो गीत गाना– हो भले ही वीर रस का वह तराना– गरजना, नारा लगाना, शक्ति अपनी क्षीण करना, दम घटाना। बड़ी मोटी खाल से उसकी सकल काया ढकी है। सिर्फ भाषा एक जो वह समझता है सबल हाथों की करारी चोट की है। ओ हमारे वज्र-दुर्दम देश के, विक्षुब्ध-क्रोधातुर जवानो ! किटकिटाकर आज अपने वज्र के-से दाँत भींचो, खड़े हो, आगे बढ़ो; ऊपर चढ़ो, बे-कण्ठ खोले। बोलना हो तो तुम्हारे हाथ की दी चोट बोले ! बहुरि बंदि खलगन सति भाएँ... खलों की (अ) स्तुति हमारे पूर्वजन करते रहे हैं, और मुझको आज लगता, ठीक ही करते रहे हैं; क्योंकि खल, अपनी तरफ से करे खलता, रहे टेढ़ी, छल भरी, विश्वासघाती चाल चलता, सभ्यता के मूल्य, मर्यादा, नियम को क्रूर पाँवों से कुचलता; वह विपक्षी को सदा आगाह करता, चेतना उसकी जगाता, नींद, तंद्रा, भ्रम भगाता शत्रु अपना खड़ा करता, और वह तगड़ा-कड़ा यदि पड़ा तो तैयार अपनी मौत की भी राह करता। आज मेरे देश की गिरि-श्रृंग उन्नत, हिम-समुज्ज्वल, तपःपावन भूमि पर जो अज़दहा आकर खड़ा है, वंदना उसकी बड़े सद्भाव से मैं कर रहा हूँ; क्योंकि अपने आप में जो हो, हमारे लिए तो वह ऐतिहासिक, मार्मिक संकेत है, चेतावनी है। और उसने कम नहीं चेतना मेरे देश की छेड़ी, जगाई। पंचशीली पँचतही ओढ़े रज़ाई, आत्मतोषी डास तोषक, सब्ज़बागी, स्वप्नदर्शी योजना का गुलगुला तकिया लगाकर, चिर-पुरातन मान्यताओं को कलेजे से सटाए, देश मेरा सो रहा था, बेखबर उससे कि जो उसके सिरहाने हो रहा था। तोप के स्वर में गरजकर, प्रध्वनित कर घाटियों का स्तब्ध अंतर, नींद आसुर अजदहे ने तोड़ दी, तंद्रा भगा दी। देश भगा दी। देश मेरा उठ पड़ा है, स्वप्न झूठा पलक-पुतली से झड़ा है, आँख फाड़े घूरता है घृण्य, नग्न यथार्थ को जो सामने आकर खड़ा है। प्रांत, भाषा धर्म अर्थ-स्वार्थ का जो वात रोग लगा हुआ था– अंग जिससे अंग से बिलगा हुआ था... एक उसका है लगा धक्का कि वह गायब हुआ-सा लग रहा है, हो रहा है प्रकट मेरे देश का अब रूप सच्चा ! अज़दहे, हम किस क़दर तुझको सराहें, दाहिना ही सिद्ध तू हमको हुआ है गो कि चलता रहा बाएँ।

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