FB 2246 - बाबूजी की एक कविता , जो शायद देश काल और समाज की परिस्थितियों से दुखित हो , इस व्यंग को लिखा हो । व्यंग तीखा है , पर कहीं ना कहीं , कवि की मनहस्थिति को अंकित करता है : आओ, नूतन वर्ष मना लें! गृह-विहीन बन वन-प्रयास का तप्त आँसुओं, तप्त श्वास का, एक और युग बीत रहा है, आओ इस पर हर्ष मना लें! आओ, नूतन वर्ष मना लें! उठो, मिटा दें आशाओं को, दबी छिपी अभिलाषाओं को, आओ, निर्ममता से उर में यह अंतिम संघर्ष मना लें! आओ, नूतन वर्ष मना लें ! हुई बहुत दिन खेल मिचौनी, बात यही थी निश्चित होनी, आओ, सदा दुखी रहने का जीवन में आदर्श बना लें! आओ, नूतन वर्ष मना लें! ~ हरिवंश राय बच्चन

An enigmatic superstar | The Shahenshah of Bollywood

FB 2246 - बाबूजी की एक कविता , जो शायद देश काल और समाज की परिस्थितियों से दुखित हो , इस व्यंग को लिखा हो । व्यंग तीखा है , पर कहीं ना कहीं , कवि की मनहस्थिति को अंकित करता है : आओ, नूतन वर्ष मना लें! गृह-विहीन बन वन-प्रयास का तप्त आँसुओं, तप्त श्वास का, एक और युग बीत रहा है, आओ इस पर हर्ष मना लें! आओ, नूतन वर्ष मना लें! उठो, मिटा दें आशाओं को, दबी छिपी अभिलाषाओं को, आओ, निर्ममता से उर में यह अंतिम संघर्ष मना लें! आओ, नूतन वर्ष मना लें ! हुई बहुत दिन खेल मिचौनी, बात यही थी निश्चित होनी, आओ, सदा दुखी रहने का जीवन में आदर्श बना लें! आओ, नूतन वर्ष मना लें! ~ हरिवंश राय बच्चन

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