FB 2178 - A dialogue of my Ef Sudhir : Mental hygiene... मानसिक स्वच्छता । मानसिक आरोग्य । मानसिक स्वास्थ्य । कुछ भी नाम दे ... लेकिन है बड़ी चीज । बचपन में मेरे लिए कोई समस्या बड़ी नहीं होती थी । मेरा मतलब है जब तक माँ या पिताजी परेशान नहीं होते । वे हमेशा कुछ ना कुछ प्रयोजन करते थे । जैसे, घर में कोई बिजली या मरम्मत का काम होता तब पिताजी सरकारी दफ्तर को पत्र लिखते थे । पुराना अँग्रेजों के जमाने का मकान था । घोडों के तबेले थे, बडा सा आँगन था । बडे बडे पेड थे । मैने राजनयिक नम्रता से पत्र लिखने की कला पिताजी से सीखी । ऐसी भाषा लिखते थे कि साँप का मरना तो दूर वह चुपचाप खेतों में जाकर काम पर लग जाता । और ऐसी कई बातें हम बचपन में सीखते हैं । त्यौहार कैसे मनाना । अतिथियों का स्वागत कैसे करना । अपनी चीजों का खयाल कैसे रखना । मैने तो first aid भी घर में सीखा । छोटी छोटी बाते हैं लेकिन मानसिक स्वास्थ्य के बहुत उपयोगी है । पिताजी और माँ में एक खास बात थी । दोनों ने जीवन के नियम बनाए थे । (मेरे व्यवहारों में थोडीसी भी भूल या विकृति होती तो तुरंत सुधार करते थे । ) मैं समझता हूँ कि ये अनुभव से नहीं होता । और जो नियंत्रण अनुभव से नहीं होता वह संस्कारों से होता है । मेरा मानना है कि मानसिक स्वच्छता का सारा भार संस्कारों पर होता है । सस्नेह सुधीर

An enigmatic superstar | The Shahenshah of Bollywood

FB 2178 - A dialogue of my Ef Sudhir : Mental hygiene... मानसिक स्वच्छता । मानसिक आरोग्य । मानसिक स्वास्थ्य । कुछ भी नाम दे ... लेकिन है बड़ी चीज । बचपन में मेरे लिए कोई समस्या बड़ी नहीं होती थी । मेरा मतलब है जब तक माँ या पिताजी परेशान नहीं होते । वे हमेशा कुछ ना कुछ प्रयोजन करते थे । जैसे, घर में कोई बिजली या मरम्मत का काम होता तब पिताजी सरकारी दफ्तर को पत्र लिखते थे । पुराना अँग्रेजों के जमाने का मकान था । घोडों के तबेले थे, बडा सा आँगन था । बडे बडे पेड थे । मैने राजनयिक नम्रता से पत्र लिखने की कला पिताजी से सीखी । ऐसी भाषा लिखते थे कि साँप का मरना तो दूर वह चुपचाप खेतों में जाकर काम पर लग जाता । और ऐसी कई बातें हम बचपन में सीखते हैं । त्यौहार कैसे मनाना । अतिथियों का स्वागत कैसे करना । अपनी चीजों का खयाल कैसे रखना । मैने तो first aid भी घर में सीखा । छोटी छोटी बाते हैं लेकिन मानसिक स्वास्थ्य के बहुत उपयोगी है । पिताजी और माँ में एक खास बात थी । दोनों ने जीवन के नियम बनाए थे । (मेरे व्यवहारों में थोडीसी भी भूल या विकृति होती तो तुरंत सुधार करते थे । ) मैं समझता हूँ कि ये अनुभव से नहीं होता । और जो नियंत्रण अनुभव से नहीं होता वह संस्कारों से होता है । मेरा मानना है कि मानसिक स्वच्छता का सारा भार संस्कारों पर होता है । सस्नेह सुधीर

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