FB 1912 - I am no poet, but I wrote some this morning .. they are words from the heart .. I also give my link to the Blog I wrote last night, because there is mention of it in the poem .. but first the poem .. the link to my Blog is at the end .. जी हाँ हुज़ूर , मैं लिखता हूँ , प्रतिदिन मैं अपना Blog लिखता हूँ , दिन चर्या के बाद मैं लिखता हूँ , मध्य रात्रि को मैं लिखता हूँ , हाँ, पर लिखता मैं अवश्य हूँ । इसे लिखते लिखेते 10 साल हो गए , आज उसके 3611, दिन पूरे हो गए , साथ ही उसके, चार पाँच सौ Ef मिल गए , मानो निजी परिवार के सदस्य बन गए , इन सदस्यों को मैं पहचानता हूँ , इनका स्नेह मैं सँवारता हूँ दुःख सुख के साथी बन गए हैं ये जन्म अंत के साथी बन गए हैं ये , ना भूलूँ गा इन्हें, इनके प्यार को कभी , लाख आलोचना कर ले, मेरी, इनकी, कोई भी , तुम होते कौन हो मुझ पर अपशब्द बोलने वालो, लांछन , आरोप , दुर्भाशी वालो , सत्य से परे , बहकाये गए वालो ; सुनो , स्नेह प्यार आदर से मिलाप करता हूँ मैं नासमझ नहीं , समझदार हूँ मैं मेरे पद चिन्हों को जो समझते हो तुम उस समझ की समझ से परे हो तुम बहुतेरे दाग़ छिड़काए गए बरसों मुझपर दोषी अपराधी दंड बरसाए गए मुझपर , ना छुआ शरीर के उन दाग़ों को मैंने ना प्रयत्न किया धुलाई लीपा - पोती की मैंने , सालों साल वो मेरे 'आभूषण' बन खिले पुष्प बन, सुगंधित सजे आकार मुझे मिले सहता रहा उन 'मालियों की सींचन' को 'सौ घड़ा सींचते' रहे मेरे इस 'पौधे' को जानते नहीं हो तुम हमारी इस कहावत को ? 'रितु आए फल होए' की इस ज़ुबानी को ? समय बलवान होता है मेरे आलोचक समय के साथ ही दृष्टि होती है रोचक जिस दिन बदलेगा समझ जाओगे तुम कौन कितने पानी में, प्रतिबिंबित होगे तुम 'क्षमा' नहीं तब करूँगा तुमको मैं ये शब्द निर्जीव है , इसका बहिष्कार करूँगा मैं गले लगाके अपने हृदय का परिचय दूँगा मैं धड़कनों को मिलाने का प्रयत्न करूँगा मैं इंसान हूँ , इंसानियत को पहचानता हूँ मैं , टूटते को जोड़ने का महत्व समझता हूँ मैं क्या करोगे दूरियों को बढ़ाने में तुम , दूर कितना ले जाओगे विश्व के इस गोलाकार में तुम ; सीमित जीवन के इस पहर में कहाँ जाओगे तुम ? कहाँ तक खींचोगे इस दुशप्रभाव को तुम, भस्म हो जाओगे इकदिन अग्नि या धरती में तुम रह जाओगे राख बन, निर्जीव गली हड्डियों में तुम जन्म फिर हो ना हो, गुम हो जाओगे तुम विचार व्यवहार से लुप्त हो जाओगे तुम पर सुनो पुनर जन्म यदि हुआ फिर पुनर जन्म यदि हुआ फिर कहीं उधर के बन के आए तो ... फिर !!! ~ अमिताभ बच्चन And my Blog link is this : https://tmblr.co/ZwrX5v2V2opjv

An enigmatic superstar | The Shahenshah of Bollywood

Amitabh Bachchan, An enigmatic superstar | The Shahenshah of Bollywood

FB 1912 - I am no poet, but I wrote some this morning .. they are words from the heart .. I also give my link to the Blog I wrote last night, because there is mention of it in the poem .. but first the poem .. the link to my Blog is at the end ..

जी हाँ हुज़ूर , मैं लिखता हूँ ,
प्रतिदिन मैं अपना Blog लिखता हूँ ,
दिन चर्या के बाद मैं लिखता हूँ ,
मध्य रात्रि को मैं लिखता हूँ ,

हाँ, पर लिखता मैं अवश्य हूँ ।

इसे लिखते लिखेते 10 साल हो गए ,
आज उसके 3611, दिन पूरे हो गए ,
साथ ही उसके, चार पाँच सौ Ef मिल गए ,
मानो निजी परिवार के सदस्य बन गए ,

इन सदस्यों को मैं पहचानता हूँ ,
इनका स्नेह मैं सँवारता हूँ
दुःख सुख के साथी बन गए हैं ये
जन्म अंत के साथी बन गए हैं ये ,

ना भूलूँ गा इन्हें, इनके प्यार को कभी ,
लाख आलोचना कर ले, मेरी, इनकी, कोई भी ,

तुम होते कौन हो मुझ पर अपशब्द बोलने वालो,
लांछन , आरोप , दुर्भाशी वालो ,
सत्य से परे , बहकाये गए वालो ;

सुनो ,

स्नेह प्यार आदर से मिलाप करता हूँ मैं
नासमझ नहीं , समझदार हूँ मैं
मेरे पद चिन्हों को जो समझते हो तुम
उस समझ की समझ से परे हो तुम
बहुतेरे दाग़ छिड़काए गए बरसों मुझपर
दोषी अपराधी दंड बरसाए गए मुझपर ,

ना छुआ शरीर के उन दाग़ों को मैंने
ना प्रयत्न किया धुलाई लीपा - पोती की मैंने ,
सालों साल वो मेरे 'आभूषण' बन खिले
पुष्प बन, सुगंधित सजे आकार मुझे मिले

सहता रहा उन 'मालियों की सींचन' को
'सौ घड़ा सींचते' रहे मेरे इस 'पौधे' को
जानते नहीं हो तुम हमारी इस कहावत को ?
'रितु आए फल होए' की इस ज़ुबानी को ?
समय बलवान होता है मेरे आलोचक
समय के साथ ही दृष्टि होती है रोचक
जिस दिन बदलेगा समझ जाओगे तुम
कौन कितने पानी में, प्रतिबिंबित होगे तुम

'क्षमा' नहीं तब करूँगा तुमको मैं
ये शब्द निर्जीव है , इसका बहिष्कार करूँगा मैं
गले लगाके अपने हृदय का परिचय दूँगा मैं
धड़कनों को मिलाने का प्रयत्न करूँगा मैं

इंसान हूँ , इंसानियत को पहचानता हूँ मैं ,
टूटते को जोड़ने का महत्व समझता हूँ मैं
क्या करोगे दूरियों को बढ़ाने में तुम ,
दूर कितना ले जाओगे विश्व के इस गोलाकार में तुम ;

सीमित जीवन के इस पहर में कहाँ जाओगे तुम ?
कहाँ तक खींचोगे इस दुशप्रभाव को तुम,
भस्म हो जाओगे इकदिन अग्नि या धरती में तुम
रह जाओगे राख बन, निर्जीव गली हड्डियों में तुम

जन्म फिर हो ना हो, गुम हो जाओगे तुम
विचार व्यवहार से लुप्त हो जाओगे तुम

पर सुनो
पुनर जन्म यदि हुआ फिर
पुनर जन्म यदि हुआ फिर
कहीं उधर के बन के आए तो ... फिर !!!

~ अमिताभ बच्चन

And my Blog link is this : https://tmblr.co/ZwrX5v2V2opjv https://tmblr.co/ZwrX5v2V2opjv

FB 1912 - I am no poet, but I wrote some this morning .. they are words from the heart .. I also give my link to the Blog I wrote last night, because there is mention of it in the poem .. but first the poem .. the link to my Blog is at the end .. जी हाँ हुज़ूर , मैं लिखता हूँ , प्रतिदिन मैं अपना Blog लिखता हूँ , दिन चर्या के बाद मैं लिखता हूँ , मध्य रात्रि को मैं लिखता हूँ , हाँ, पर लिखता मैं अवश्य हूँ । इसे लिखते लिखेते 10 साल हो गए , आज उसके 3611, दिन पूरे हो गए , साथ ही उसके, चार पाँच सौ Ef मिल गए , मानो निजी परिवार के सदस्य बन गए , इन सदस्यों को मैं पहचानता हूँ , इनका स्नेह मैं सँवारता हूँ दुःख सुख के साथी बन गए हैं ये जन्म अंत के साथी बन गए हैं ये , ना भूलूँ गा इन्हें, इनके प्यार को कभी , लाख आलोचना कर ले, मेरी, इनकी, कोई भी , तुम होते कौन हो मुझ पर अपशब्द बोलने वालो, लांछन , आरोप , दुर्भाशी वालो , सत्य से परे , बहकाये गए वालो ; सुनो , स्नेह प्यार आदर से मिलाप करता हूँ मैं नासमझ नहीं , समझदार हूँ मैं मेरे पद चिन्हों को जो समझते हो तुम उस समझ की समझ से परे हो तुम बहुतेरे दाग़ छिड़काए गए बरसों मुझपर दोषी अपराधी दंड बरसाए गए मुझपर , ना छुआ शरीर के उन दाग़ों को मैंने ना प्रयत्न किया धुलाई लीपा - पोती की मैंने , सालों साल वो मेरे 'आभूषण' बन खिले पुष्प बन, सुगंधित सजे आकार मुझे मिले सहता रहा उन 'मालियों की सींचन' को 'सौ घड़ा सींचते' रहे मेरे इस 'पौधे' को जानते नहीं हो तुम हमारी इस कहावत को ? 'रितु आए फल होए' की इस ज़ुबानी को ? समय बलवान होता है मेरे आलोचक समय के साथ ही दृष्टि होती है रोचक जिस दिन बदलेगा समझ जाओगे तुम कौन कितने पानी में, प्रतिबिंबित होगे तुम 'क्षमा' नहीं तब करूँगा तुमको मैं ये शब्द निर्जीव है , इसका बहिष्कार करूँगा मैं गले लगाके अपने हृदय का परिचय दूँगा मैं धड़कनों को मिलाने का प्रयत्न करूँगा मैं इंसान हूँ , इंसानियत को पहचानता हूँ मैं , टूटते को जोड़ने का महत्व समझता हूँ मैं क्या करोगे दूरियों को बढ़ाने में तुम , दूर कितना ले जाओगे विश्व के इस गोलाकार में तुम ; सीमित जीवन के इस पहर में कहाँ जाओगे तुम ? कहाँ तक खींचोगे इस दुशप्रभाव को तुम, भस्म हो जाओगे इकदिन अग्नि या धरती में तुम रह जाओगे राख बन, निर्जीव गली हड्डियों में तुम जन्म फिर हो ना हो, गुम हो जाओगे तुम विचार व्यवहार से लुप्त हो जाओगे तुम पर सुनो पुनर जन्म यदि हुआ फिर पुनर जन्म यदि हुआ फिर कहीं उधर के बन के आए तो ... फिर !!! ~ अमिताभ बच्चन And my Blog link is this : https://tmblr.co/ZwrX5v2V2opjv https://tmblr.co/ZwrX5v2V2opjv

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