FB 1898 - Ashok Chakradhar ki anokhi batein .. जय लक्ष्मी कुट्टी —चौं रे चम्पू! तेरे काऊ परिचित कूं पदमसिरी मिली? —अनेक को मिली, लेकिन इस बार पद्म-अलंकरण ऐसी अनेक विभूतियों को मिले, जिन्होंने अभावों में रहकर भी मानवता के कल्याण के लिए अनथक सेवा की। किसी को अनुमान नहीं था कि सरकार का ध्यान उनकी सेवाओं की ओर जा सकता है। ऐसे साधक जिन्हें गूगल जानता था न मीडिया! एक हैं केरल के ग़रीब आदिवासी क्षेत्र की चिकित्सक लक्ष्मी कुट्टी। छ: सौ जड़ी-बूटियों का गहरा ज्ञान है। पढ़ी-लिखी योग्य महिला हैं। वैसे भी केरल में साक्षरता सर्वाधिक है। उनसे प्रेरित होकर केरल की असंख्य युवतियां नर्स बनकर देशभर में सेवा-भावना से काम करती हैं। वे स्वयं हर्बल औषधियां बनाती हैं। सर्पदंश, बिच्छूडंक और ज़हरीले कीड़ों का ज़हर उतारने की विशेषज्ञ हैं। लाखों लाभान्वित हुए। उनकी बनाई घुट्टी पीकर बच्चे शक्तिशाली, प्रतिभावान और कर्मठ बनते हैं। मैंने ‘ओम जय जगदीश हरे’ की तर्ज़ पर अम्मा लक्ष्मी कुट्टी की एक आरती लिखी है। सुनाऊं? —मैं संग में घंटी बजाऊं का? —मेरे अंदर घंटी बजी, तभी तो लिखी। आरती में उनकी महत्ता का गुणगान किया है, उनसे कुछ वरदान मांगे हैं और अंत में आरती गाने का महात्म्य भी बताया है। ऐसे ही सुनिए— जय लक्ष्मी कुट्टी, मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! सर्पदंश के विष की, नागवंश के विष की, कर डाली छुट्टी। अम्मा जय लक्ष्मी कुट्टी! लक्ष्मी होकर ख़ुद लक्ष्मी से, ना चाही माया। मैया ना चाही माया। जड़ी-बूटियां घोट-घोट कर, पद्मासन पाया। अम्मा पद्मासन पाया। धन वालों की लक्ष्मी जी से, सदा रखी कुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! सर्प एक आतंकवाद का खुलकर फुफ्कारे। मैया खुलकर फुफ्कारे। हिजबुल होगा ध्वस्त अगर तू, ‘हिज़’ बल होगा ध्वस्त अगर तू, हरबल से मारे। अम्मा ‘हर’ बल से मारे। रोएं सारे विषधर फणिधर, हाय क़िस्मत फुट्टी! मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! राजनीति के वोट-पिपासू, खोट-दंश मारें। मैया खोट-दंश मारें। जन का ज़हर उतार भवानी, सब के सब हारें। अम्मा सब के सब हारें। कर उनका संहार बैठ जो, बिठा रहे गुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! लोन का अजगर निगल गया, सब अपटूडेटों को। महंगाई की डायन डंस गई, भूखे पेटों को। भर दे ख़ाली सूराखों में, जीवन की पुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! पद्म श्री तू, पद्मासनि तू, पद्मावति नांहीं। मैया पद्मावति नांहीं। तेरी औषधि के बिन जग में, कोई गति नांहीं। अम्मा कोई गति नांहीं। सर्प हुए विष-दंतहीन तब बनी ज़हरबुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! कुट्टी जी की आरति कोई, सांप अगर गावै। मैया सांप अगर गावै। हटे कैंचुली, नंगा होकर, बिल में घुस जावै। अम्मा बिल में घुस जावै। बिल के अंदर बिलबिलाय और मारै लुटलुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! कुट्टी जी की आरति कोई, नौजवान गावै। मैया नौजवान गावै। करे देश का नाम, श्रेष्ठ वह रोज़गार पावै। अम्मा रोज़गार पावै। अपने सारे नौनिहाल अब, पिएं तेरी घुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! जय लक्ष्मी कुट्टी, मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! सर्पदंश के विष की, नागवंश के विष की, कर डाली छुट्टी। अम्मा जय लक्ष्मी कुट्टी! —संग में घंटी ऊ बजाते तौ भौत आनंद आतौ। बगीची पै फिरकित्ती सुनइयो!

An enigmatic superstar | The Shahenshah of Bollywood

Amitabh Bachchan, An enigmatic superstar | The Shahenshah of Bollywood

FB 1898 - Ashok Chakradhar ki anokhi batein ..

जय लक्ष्मी कुट्टी



—चौं रे चम्पू! तेरे काऊ परिचित कूं पदमसिरी मिली?

—अनेक को मिली, लेकिन इस बार पद्म-अलंकरण ऐसी अनेक विभूतियों को मिले, जिन्होंने अभावों में रहकर भी मानवता के कल्याण के लिए अनथक सेवा की। किसी को अनुमान नहीं था कि सरकार का ध्यान उनकी सेवाओं की ओर जा सकता है। ऐसे साधक जिन्हें गूगल जानता था न मीडिया! एक हैं केरल के ग़रीब आदिवासी क्षेत्र की चिकित्सक लक्ष्मी कुट्टी। छ: सौ जड़ी-बूटियों का गहरा ज्ञान है। पढ़ी-लिखी योग्य महिला हैं। वैसे भी केरल में साक्षरता सर्वाधिक है। उनसे प्रेरित होकर केरल की असंख्य युवतियां नर्स बनकर देशभर में सेवा-भावना से काम करती हैं। वे स्वयं हर्बल औषधियां बनाती हैं। सर्पदंश, बिच्छूडंक और ज़हरीले कीड़ों का ज़हर उतारने की विशेषज्ञ हैं। लाखों लाभान्वित हुए। उनकी बनाई घुट्टी पीकर बच्चे शक्तिशाली, प्रतिभावान और कर्मठ बनते हैं। मैंने ‘ओम जय जगदीश हरे’ की तर्ज़ पर अम्मा लक्ष्मी कुट्टी की एक आरती लिखी है। सुनाऊं?

—मैं संग में घंटी बजाऊं का?

—मेरे अंदर घंटी बजी, तभी तो लिखी। आरती में उनकी महत्ता का गुणगान किया है, उनसे कुछ वरदान मांगे हैं और अंत में आरती गाने का महात्म्य भी बताया है। ऐसे ही सुनिए—


जय लक्ष्मी कुट्टी,
मैया जय लक्ष्मी कुट्टी!
सर्पदंश के विष की, नागवंश के विष की,
कर डाली छुट्टी। अम्मा जय लक्ष्मी कुट्टी!

लक्ष्मी होकर ख़ुद लक्ष्मी से,
ना चाही माया। मैया ना चाही माया।
जड़ी-बूटियां घोट-घोट कर,
पद्मासन पाया। अम्मा पद्मासन पाया।
धन वालों की लक्ष्मी जी से,
सदा रखी कुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी!

सर्प एक आतंकवाद का
खुलकर फुफ्कारे। मैया खुलकर फुफ्कारे।
हिजबुल होगा ध्वस्त अगर तू,
‘हिज़’ बल होगा ध्वस्त अगर तू,
हरबल से मारे। अम्मा ‘हर’ बल से मारे।
रोएं सारे विषधर फणिधर,
हाय क़िस्मत फुट्टी! मैया जय लक्ष्मी कुट्टी!

राजनीति के वोट-पिपासू,
खोट-दंश मारें। मैया खोट-दंश मारें।
जन का ज़हर उतार भवानी,
सब के सब हारें। अम्मा सब के सब हारें।
कर उनका संहार बैठ जो,
बिठा रहे गुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी!

लोन का अजगर निगल गया,
सब अपटूडेटों को।
महंगाई की डायन डंस गई,
भूखे पेटों को।
भर दे ख़ाली सूराखों में,
जीवन की पुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी!

पद्म श्री तू, पद्मासनि तू,
पद्मावति नांहीं। मैया पद्मावति नांहीं।
तेरी औषधि के बिन जग में,
कोई गति नांहीं। अम्मा कोई गति नांहीं।
सर्प हुए विष-दंतहीन
तब बनी ज़हरबुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी!

कुट्टी जी की आरति कोई,
सांप अगर गावै। मैया सांप अगर गावै।
हटे कैंचुली, नंगा होकर,
बिल में घुस जावै। अम्मा बिल में घुस जावै।
बिल के अंदर बिलबिलाय और
मारै लुटलुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी!

कुट्टी जी की आरति कोई,
नौजवान गावै। मैया नौजवान गावै।
करे देश का नाम, श्रेष्ठ वह
रोज़गार पावै। अम्मा रोज़गार पावै।
अपने सारे नौनिहाल अब,
पिएं तेरी घुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी!

जय लक्ष्मी कुट्टी,
मैया जय लक्ष्मी कुट्टी!
सर्पदंश के विष की, नागवंश के विष की,
कर डाली छुट्टी। अम्मा जय लक्ष्मी कुट्टी!


—संग में घंटी ऊ बजाते तौ भौत आनंद आतौ। बगीची पै फिरकित्ती सुनइयो!

FB 1898 - Ashok Chakradhar ki anokhi batein .. जय लक्ष्मी कुट्टी —चौं रे चम्पू! तेरे काऊ परिचित कूं पदमसिरी मिली? —अनेक को मिली, लेकिन इस बार पद्म-अलंकरण ऐसी अनेक विभूतियों को मिले, जिन्होंने अभावों में रहकर भी मानवता के कल्याण के लिए अनथक सेवा की। किसी को अनुमान नहीं था कि सरकार का ध्यान उनकी सेवाओं की ओर जा सकता है। ऐसे साधक जिन्हें गूगल जानता था न मीडिया! एक हैं केरल के ग़रीब आदिवासी क्षेत्र की चिकित्सक लक्ष्मी कुट्टी। छ: सौ जड़ी-बूटियों का गहरा ज्ञान है। पढ़ी-लिखी योग्य महिला हैं। वैसे भी केरल में साक्षरता सर्वाधिक है। उनसे प्रेरित होकर केरल की असंख्य युवतियां नर्स बनकर देशभर में सेवा-भावना से काम करती हैं। वे स्वयं हर्बल औषधियां बनाती हैं। सर्पदंश, बिच्छूडंक और ज़हरीले कीड़ों का ज़हर उतारने की विशेषज्ञ हैं। लाखों लाभान्वित हुए। उनकी बनाई घुट्टी पीकर बच्चे शक्तिशाली, प्रतिभावान और कर्मठ बनते हैं। मैंने ‘ओम जय जगदीश हरे’ की तर्ज़ पर अम्मा लक्ष्मी कुट्टी की एक आरती लिखी है। सुनाऊं? —मैं संग में घंटी बजाऊं का? —मेरे अंदर घंटी बजी, तभी तो लिखी। आरती में उनकी महत्ता का गुणगान किया है, उनसे कुछ वरदान मांगे हैं और अंत में आरती गाने का महात्म्य भी बताया है। ऐसे ही सुनिए— जय लक्ष्मी कुट्टी, मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! सर्पदंश के विष की, नागवंश के विष की, कर डाली छुट्टी। अम्मा जय लक्ष्मी कुट्टी! लक्ष्मी होकर ख़ुद लक्ष्मी से, ना चाही माया। मैया ना चाही माया। जड़ी-बूटियां घोट-घोट कर, पद्मासन पाया। अम्मा पद्मासन पाया। धन वालों की लक्ष्मी जी से, सदा रखी कुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! सर्प एक आतंकवाद का खुलकर फुफ्कारे। मैया खुलकर फुफ्कारे। हिजबुल होगा ध्वस्त अगर तू, ‘हिज़’ बल होगा ध्वस्त अगर तू, हरबल से मारे। अम्मा ‘हर’ बल से मारे। रोएं सारे विषधर फणिधर, हाय क़िस्मत फुट्टी! मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! राजनीति के वोट-पिपासू, खोट-दंश मारें। मैया खोट-दंश मारें। जन का ज़हर उतार भवानी, सब के सब हारें। अम्मा सब के सब हारें। कर उनका संहार बैठ जो, बिठा रहे गुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! लोन का अजगर निगल गया, सब अपटूडेटों को। महंगाई की डायन डंस गई, भूखे पेटों को। भर दे ख़ाली सूराखों में, जीवन की पुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! पद्म श्री तू, पद्मासनि तू, पद्मावति नांहीं। मैया पद्मावति नांहीं। तेरी औषधि के बिन जग में, कोई गति नांहीं। अम्मा कोई गति नांहीं। सर्प हुए विष-दंतहीन तब बनी ज़हरबुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! कुट्टी जी की आरति कोई, सांप अगर गावै। मैया सांप अगर गावै। हटे कैंचुली, नंगा होकर, बिल में घुस जावै। अम्मा बिल में घुस जावै। बिल के अंदर बिलबिलाय और मारै लुटलुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! कुट्टी जी की आरति कोई, नौजवान गावै। मैया नौजवान गावै। करे देश का नाम, श्रेष्ठ वह रोज़गार पावै। अम्मा रोज़गार पावै। अपने सारे नौनिहाल अब, पिएं तेरी घुट्टी। मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! जय लक्ष्मी कुट्टी, मैया जय लक्ष्मी कुट्टी! सर्पदंश के विष की, नागवंश के विष की, कर डाली छुट्टी। अम्मा जय लक्ष्मी कुट्टी! —संग में घंटी ऊ बजाते तौ भौत आनंद आतौ। बगीची पै फिरकित्ती सुनइयो!

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